Sunday, 22 September 2024

 

                                                                        उद्योग

            माथे पर झिलमिलाता सूरज धीरे-धीरे सरकते हुए धारा में धूमिल हो रहा था. ये बूँदें इस बात की द्योतक नहीं थीं कि परिश्रम उन बूँदों के अस्तित्व का कारण था. मन का उन्माद इन बूँदों की उत्पत्ति  का  वजह था. अशांत शरीर ही नहीं, अशांत मन भी शरीर को पसीने से भिंगो देता है. जहाँ प्रकाश से आसपास की हर वस्तु एकदम स्पष्ट दिखाई दे रही थी, वहीँ मन में आशा की किरण एकदम विलुप्त थी. भृकुटियाँ भी बोझिल थीं और मानों माथे से गिरी जा रही थीं.  नेत्र देख तो रहे, किन्तु कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था. भुजाओं में ये कैसा कम्पन है! वो मांसपेशियाँ जो कभी आतुर थीं पौरुष और पुरुषार्थ की, वो एकदम शिथिल क्यों हैं?

          किसी विषय पर शंकित होना, यह मनुष्य जाति  के कौतुहल और वैज्ञानिक मानसिकता का प्रतीक है, किन्तु  यह शंका जब स्वयं की पराकाष्ठा का माप हो जाय तो वह पतन की ध्वनि है. बार-बार यही विचार मन को आन्दोलित कर रहा था -- ``यह कैसे हो पायेगा मुझसे, क्या होगा उन नागरिकों का जो इतने वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या होगा उन माताओं का जो अपने पुत्रों के लौटने की राह देख रही हैं? क्या मैं उनके दुःख का कारण बनूँगा? क्या उत्तर होगा मेरे पास जब लौटने पर मुझसे प्रश्न किया जायेगा. जिनके स्नेह और विश्वास ही मेरे अस्तित्व का कारण है, उन्हें कैसे निराश करूँगा?”

          जब मन  में ऐसे प्रश्नों का झंझावात आता है तो मानों हर तरफ बस आशंका की बर्फ गिरती दिखाई देती है. चाहे जितना भी प्रयास कर लो आगे देखने का, कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता. हर एक प्रयास विफल हो जाता है और मन निराशा की खाई में बहुत वेग से अन्धकार में गिरने लगता है. यही स्थिति थी उनकी.

          दृष्टि भूमि पर गड़ी थी और मस्तिष्क में कोई उपाय सूझ नहीं रहा था. श्वास की नली मानों हर सांस पर संकुचित हो रही थी. हुँकार के स्थान पर बस विवशता और पीड़ा के कुछ शब्द होठों को खरोंच रहे थे.  उन शब्दों की कोई स्थापित परिभाषा नहीं थी, वो बस भ्रमित मन के भटकते विचारों के विस्फोट थे.

          तभी किसी कारण उन्होंनेअपना मुख प्रभु की नगरी की तरफ मोड़ा और सूर्य की गर्मी ने एकाएक एक विचार प्रस्फुटित किया -- ``अरे! उस स्थान पर तो अभी मैंने ढूंढा ही नहीं .” शरीर में फिर से कंपन हुआ किन्तु यह कंपन अलग था. आशा की ऊर्जा निराशा की बर्फ पिघला रही थी – जैसे उनकी भुजाओं ने उन्हें ही चुनौती दी और साथ में एक उलाहना भी. मानों कहा – जागो, उठो, गिरो किन्तु फिर उठो.” एक एक कदम एक एक योजन की दूरी नाप रहे थे. कुछ ही समय में वाटिका दिखाई दी. ममता और करुणा से पूर्ण एक प्रश्न कौंधा – ``कौन?”

``माते! मैं हनुमान.”

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