Tuesday, 18 October 2022

 

प्र्याण

शरीर शून्य लग रहा है। वो भुजाएँ जो दिशाएँ इंगित करती थीं, आज निर्जीव शाखा जैसी लटक रही हैं। स्तंभ की भाँति जंघाओं की एक-एक मांसपेशियों में बस वेदना हो रही है। कैसे संभालूँ अपने अस्त्र, कैसे सन्तुलित करूँ अपने गंभीर, गठित शरीर को? सिर का किरीट फिसलता ही जा रहा है। सारी दिशाएँ समान क्यों प्रतीत होती हैं? जो नेत्र खुलकर सूर्य का स्वागत करते थे, अब जलमग्न क्यों हैं? कुछ दिखाई क्यों नहीं देता? समय इतना बोझिल क्यों प्रतीत हो रहा? ध्यान खंडित क्यों हो रहा है? दृष्टि धुंधली किस कारण है?

         मैं तो महारथियों का गुरु हूँ। आज जिस प्रवीणता से वे अस्त्रों का संधान करते हैं -- मैने ही तो शिक्षा दी है उन्हें। उनके समक्ष ऐसे निष्क्रिय, निरर्थक, विवश किस प्रकार दीख सकता हूँ मैं? कहाँ है मेरा स्वाभिमान, मेरा अभिमान? क्यों नहीं रोक पा रहा अपने इस अनादर को जो निर्लज्ज होकर, मुँह फाड़कर अट्टहास कर रहा है? कैसे इस अपमान की पीड़ा मुझे भस्म नहीं कर रही? क्यों नहीं हो रही मुझे मेरे अपमान की पीड़ा?

         कहीं छिप भी तो नहीं सकता। यहाँ आसपास कोई वन नहीं, वृक्ष नहीं, बस योद्धाओं का महासागर है और मैं इस सागर में जलमग्न हूँ।

         निस्सन्देह यह सत्य है, मिथ्या होने का  कोई कारण हो ही नहीं सकता। सत्य है कि मैं खो चुका हूँ अपने जीवन के  कारण को। अब क्या शेष है मेरे पास अपने शिष्यों को देने के लिये। बस एक आश्वासन और संतोष है मन में। समय आ चुका है उस प्रयाण का, जो निश्चित है, बस अनिश्चित है उसके आने का  समय। किन्तु निस्सन्देह वह समय निकट है।

         अपने नेत्रों को बंद करके समय आ गया है अपने शरीर को समेटने का। इस समय से उचित और कौन सा समय होगा, जब मेरे सर्वप्रिय मेरे निकट हैं? काश! वे दोनों भी होते इस पावन अवसर पर।

         कर्म का चक्र संपूर्ण हो गया है। अब तो बस भगवत्‌ में लीन होना है। कौन कहता है  यहाँ अंधकार है? यहाँ तो बस प्रेम का प्रकाश है। क्यों व्यर्थ किया मैंने इतना समय? बहुत वर्षों पहले  ही  इस प्रकाश में लिप्त हो जाना चाहिए था मुझे। समय का भान भी अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।

         पीड़ा भी उतनी नहीं। न किसी से मिलने का उत्साह है, न बिछड़ने का  दुःख। किन्तु उस पीड़ा से व्यथित हूँ कि अश्वत्थामा मारा गया।

                                             हरि ओम!

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